
एक गृहणी सिर्फ़ रसोई नहीं संभालती,
वह पूरे घर की धड़कन संभालती है।
थके चेहरों पर मुस्कान सजाती है,
और अपनी चाय के एक-एक घूँट में
प्यार, ममता और सुकून घोल देती है।
इसी गृहणी की दुनिया को समर्पित—
मेरी कविता‘अदरक वाली चाय’।”
मैं हूँ गृहणी, मेरी पहचान—अदरक वाली चाय,
थका मन भी हंसता हो जाए—अदरक वाली चाय।
सुबह-सवेरे सबसे पहले, मेरा ही नाम पुकारे,
घर भर की रौनक बन जाए—अदरक वाली चाय।
गजरा, चूड़ी, बिंदी–झुमके, रसोई की हलचल में,
मेरे साथ ही सब मुस्काए—अदरक वाली चाय।
पायल की छन-छन कहती है, “दिन की रस्में शुरू हुईं”,
और चूल्हा भी गीत सुनाए—अदरक वाली चाय।
पिया थककर घर आए जब, माथे की लकीरें कहें,
सारे ग़म पल में मिट जाए—अदरक वाली चाय।
बच्चे स्कूल को जाते हैं, सपनों की पोटली लेकर,
उनकी हिम्मत बढ़ती जाए—अदरक वाली चाय।
तेज़ हवाओं में भी अक्सर, मैं ही घर को थामे हूँ,
हिम्मत मेरी बढ़ती जाए—अदरक वाली चाय।
मेरे हाथ की कड़क घूँट में, सुकून की दुनियाँ बसती,
दिल से “वाह!” सबके निकल जाए—अदरक वाली चाय।
दिल का रिश्ता बड़ा अनोखा, सदियों से चला आता,
दर्द छुपाए, दिल बहलाए—अदरक वाली चाय।
मैं गृहणी हूँ, मेरा अभिमान—मेहनत, ममता और प्यार,
इनसब को सुर में पिरो जाए—अदरक वाली चाय।
ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)












