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पकाते हैं जनाब

सुबह-सुबह अलार्म से नहीं, चाय से उठते हैं जनाब,
आँखें खुलें या न खुलें, पहले “चाय” पूछते हैं जनाब।

घर में दूध कम हो जाए तो मातम-सा फैल जाता है,
पर चाय मिले ठीक समय पर तो शायर बनते हैं जनाब।

ऑफिस में बॉस का गुस्सा भी चाय के आगे फीका लगे,
एक प्याली मिल जाए तो मीटिंग भी झेलते हैं जनाब।

बारिश हो या गर्मी हो, चाय का मूड कभी बदलता नहीं,
दिल बदले या न बदले, हम कप बदलते हैं जनाब।

“डाइटिंग” वाले भी कहते हैं; बस एक आख़िरी कप और,
हर ‘आख़िरी’ के बाद फिर से चाय पकाते हैं जनाब।

छाया शाह ‘सख्य’ मुंबई

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