
मुफलिसी का आलम है साया भी खुद से परहेज़ करने लगा है
जहालत ही दुनियाँ मे साब पाई पाई का हिसाब करने लगा है
अपना हमसाया भी हमसे हमारे होने का सवाल करने लगा है
जीवन भी जैसे बेहयाई की नुमाईश मे सजने सा लगा है
कभी जो अपने थे वो आज अपनापन दिखाने लगे है
अल्फाज़ों से ही मजबूरी अपनी जताने लगे है
समय का तकाजा है जिनपर हम मरते थे वो आज हमे ही मारने मे लगे है
हमारी ही बनाई नेमत से बेदखल वो हमे ही करने मे लगे है
समय है आज हम शिकार है कल वो होंगे
हम तो अपने सर रो लिये वो किसके सर रोयेंगे।
बड़ी ही बेरहम ये जिन्दगी है एक काँधे के लिये ही तरस गये
अपना कौन पराया कौन के फेर मे ही बस फँस गये
इश्वर की दुनियाँ है इश्वर ही हैरान है
क्या तेरी नियती प्रभु तन्हा हर इन्सान है
कीड़े मकोडों सी इंसानों की बस्ती है
नही कोई हैसियत किसी की ना कोई हस्ती है
जीवन है चलायमान है
मशीनी दिमाग मशीनी दिल कलपुर्ज़ा ईमान है।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












