
भैया हमारे शहर गये,
पढ लिखकर बाबू हुये।
गाँव,धरा से दूर हो गये,
वो संस्कारों को भूल गये।।
अंग्रेंजी में नित बाते करते,
मातृभाषा पर आक्षेप करते।
शहर की हमेंं रौनक दिखलाते,
शुट,बूट और वो टाई लटकाते।।
खेती बाडी़ ना वो करते,
बोतल का शुद्ध पानी पीते।
गाय,बकरी ना वो पालते,
टाॅमी के संग वो घुमने जाते।।
छोटे बडो़ का ना आदर करते,
ना अपनेपन से यूं बात करते।
नित पैसो के वो पिछे दौड़ते,
वो रिश्ते नाते नहींं पहचानते।।
ना कभी शिक्षा से हम नाराज है,
पर संस्कारों का कहाँ लिहाज है।
वो पैसो का हमें महत्व समझाते,
स्वयं अयाशी भरी पार्टिया करते।।
लानत है उस शहरी चकाचौंघ पर,
जो नित हमारे बचपन को डसता है।
हमको धन वैभव का ख्वाब़ दिखाकर,
हमारे रिश्तें व संस्कारो को खा जाता है।।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












