
ओम कश्यप
संस्कारों की छाँव में, जीवन फूल-सा खिलता है,
मर्यादा का दीप जहाँ, हर आँगन में मिलता है।
बड़ों का आदर सीखें हम, छोटों से प्रेम निभाएँ,
मीठे वचन और सच्चाई से, अपना मान बढ़ाएँ।
धन-दौलत से बड़ा जगत में, होता उत्तम व्यवहार,
जिस घर में संस्कार बसें, होता वही परिवार।
माँ की ममता, पिता का तप, जीवन का आधार,
इनसे ही ऊँचा बनता है, मानव का संसार।
क्रोध, छल और अहंकार से, सदा दूर हम रहें,
सत्य, दया और करुणा लेकर, मानवता में बहें।
दीपक बनकर जो जलते हैं, राह वही दिखलाते,
अपने उत्तम संस्कारों से, जग में मान बढ़ाते।
संस्कारों की दौलत से, जीवन महके रोज़,
इनसे ही इंसान बने, दिल से सच्चा भोज।
हम और हमारे संस्कार ही, भारत की पहचान,
इनसे ही उज्ज्वल होता है, आने वाला कल महान।
“संस्कार ही मनुष्य का सच्चा आभूषण हैं।”












