
मैं यही अपराध तो हर बार करता हूँ,
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ।
नफ़रतों के धुएँ से घुट रहा है ये जहाँ,
मैं मोहब्बत की हवा का इंतज़ार करता हूँ।
स्नेह, संवेदना की बात अब होती नहीं यहां,
पत्थरों से भी मैं फुलों का व्यापार करता हूं।
ज़ख़्म चाहे जितने मिलें रिश्तों की राहों में मगर,
हर किसी को गले लगाने का विचार करता हूँ।
झूठ के मेले में सच्चाई अकेली रह गई,
फिर भी सच कहने का साहस बार-बार करता हूँ।
चापलूसी की इस दौड़ में इंसानियत है मिट रही,
मैं आँधियों में भी चराग़ जलाने की बात करता हूं।
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई अनेकों हैं जाति धर्म यहां,
मैं फ़क़त इन्सान धर्म की ही बात करता हूं।
छोटे न जाने बड़ों की करना कदर तो अब,
मैं रवि अलबेला अकेला तहज़ीब की बात करता हूं।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ।।
रवि भूषण वर्मा












