
हे भगवान् ये तेरी दुनियाँ को क्या हो गया
जन्नत पुरसुकून की ये धरा लड़ाई का मैदान हो गया
हताश इंसान है जानवर भी हताश क्यों हो गया
क्या ऐसा हुआ बर्दास्त शब्द ही शब्दकोष से बाहर हो गया
संसार लड़ाई का एक अच्छा खासा अखाड़ा हो गया
प्रेम सदभाव व्यवहारिकता अब दूसरी दुनियाँ का पहाड़ा हो गया
दुनियाँ मे पाना अब लड़ने का दूसरा नाम है
बिना लड़े तो दुनियाँ मे प्रभु भक्ति भी हराम है
जंगल है पार करना है
भेड़ियो पर नही एतबार करना है
अपने पराये सब कलयुगी हो गये
बुराई के संसार मे मनुष्य कहीं खो गये
जीने की ये दुनियाँ तो नही जीना ही पड़ेगा
संभलने से भी ज्यादा यहाँ संभलना पड़ेगा
एतबार शब्द अब दुनियाँ के शब्दकोष से खत्म हो गया
रिश्तों का क्या कहे स्वार्थ की आंधी मे सब हवा हो गया
अब उम्मीद इस दुनियाँ से एकदम बेमानी है
जानवरों की भीड़ है कहाँ बची नैकियत कोई निशानी है
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












