
कोरे कागज की छाती पर,
पीर हृदय की लिख डाले।।
सूनी साँझों के द्वारे पर,
यादों के दीपक जलते,
टूटे सपनों की किरचों से,
अंतर के आँगन पलते।
अश्रु-बूँदे बनकर शब्दों में,
मन की गाँठें खोल डालें।
कोरे कागज की छाती पर,
पीर हृदय की लिख डाले।।
भीड़ भरे इस जग के भीतर,
कैसा एकाकीपन है,
हँसते चेहरों के पीछे भी,
छुपा हुआ क्रंदन है।
झूठे आवरण हटाकर अब,
सच को खुलकर बोल डालें।
कोरे कागज की छाती पर,
पीर हृदय की लिख डाले।।
संघर्षों की धूप झुलसती,
छाँव कहीं भी मिलती नहीं,
आशाओं के नन्हे पंछी,
थककर भी रुकते नहीं।
टूटे स्वर में भी साहस के,
कुछ स्वर फिर हम घोल डालें।
कोरे कागज की छाती पर,
पीर हृदय की लिख डाले।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार










