
मन का आईना कोई काँच नहीं,
ये तो भीगी हुई एक ख़ामोश झील है,
जिसमें हर एहसास लहर बनकर उठता है,
और हर याद एक डूबती कश्ती सी नील है।
जब दुनिया की धूल चढ़ जाती है चेहरे पर,
ये भीतर से मुझे धो देता है,
किसी अनसुनी बारिश की तरह
मेरे ही आँसुओं में मुझे रो देता है।
इसमें झाँको तो चेहरा नहीं दिखता,
दिखती हैं अधूरी दास्तानें,
कुछ बिखरे वादे, कुछ थके सपने,
कुछ अनजानी-सी पहचानें।
कभी ये आईना धड़कनों की भाषा बोलता है,
हर धड़कन में छुपा एक राज खोलता है,
जो लफ़्ज़ों से कभी कह नहीं पाते हम,
उसे खामोशी में ये सहज घोलता है।
ये आईना वक्त से भी गहरा है,
यहाँ हर पल ठहर कर सोचता है,
तुम जो दुनिया को दिखाते हो—
उससे ज़्यादा तुम्हें खुद से तौलता है।
और अजीब बात ये है—
ये कभी टूटता नहीं, बिखरता नहीं,
बस जब तुम खुद से दूर हो जाते हो,
तो ये भी चुपचाप कहीं ठहरता नहीं।
मन का आईना…
तुम्हें हर बार नया बना देता है,
तुमसे तुम्हारी मुलाक़ात करवा कर
तुम्हें फिर से “तुम” बना देता है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र










