
जिंदगी जीने का बदला सबब
मोबाइल बिन नहीं जिंदगी
अब तो बदल गया सब
छोटा हो या बड़ा सब के हाथ में मोबाइल
सरकारें हों या सभी संगठन
आप का अपना नंबर ही बताए
दुनिया में जी रहे हो अब
क्षण-क्षण की ये दुनिया नहीं तुम्हारी
कैसा समाज और कैसा जग।
रिश्ते-नाते कहां बचे हैं
भावनात्मक संबंध तो खंडित हो–
अब गए हैं बिखर
अब न बचा जजबा न ही पहले-सी फ़िक्र
बस मोबाइल पर प्रेषित कर मैसेज
कर्तव्य अपने की इतिश्री हुई ।
आप के अपने मनोभाव जो दिल समाए थे
उड़न छू हो गए
बनावटी मनोभाव की खुली हैं दुकाने
जो पसंद आए भेज दो अपने लहू के रिश्तो में
ये बनावटी मनोभाव बस !
महीन-सी अनजान डोर से बंधे गए हैं अब
प्रेम-प्यार फिर कहा बचेंगे
इन बनावटी मन के उद् गार
मनों में ठुंस गए हैं जेर-ओ-जबर
इन मैसेज की टाइल्स की इमारत पर टिके हैं
जो कभी भी ढह कर बिखर जाए
नहीं लगेगी किसी को खबर ।
उस नियंता का ये संसार
भावनात्मकता के बंधन में बंधा मानव परिवार
भावनाओं के लिए आज रहा तरस
जो अब कहीं नहीं मिलती
थोड़ी बहुत बची हैं बस लहू के रिश्तों में
अब तो ये वहां भी भिखर रही है
मनुष्य की जिंदगी कॉकरोच-सी हो गई है
जिंदगी जीने के लिए
मोबाइल ( अंधी गली ) की सीलन के सहारे
मनुष्य कॉकरोच सम कुलांचे भरे अब नित्य।
वाह रे मानव !
तूं ने तो बहुत उन्नति कर ली है
जिंदगी जीने के सभी मूल्य
अब हुए तिरोहित …. एक नई दुनिया में
उडान अब कॉकरोच भर रहा है ।
- महेश शर्मा, करनाल












