
सूरज आग उगलता है,
नभ के खड़ा होकर।
पंछी भी चुप बैठे हैं,
अपने घोंसले में जाकर।
हवा के झोंके भी फिरते है ,
अब तपिश लिए लेकर।
मानो मौसम ने ओढ़ लिया
अग्नि का गरम चादर।
तपती धूप ने धरती को,
अग्नि सा अंगार बना डाला।
नदियों का जल भी जैसे,
खुद को उबाल डाला।
हे मेघराज! दया करो ,
अब अमृत की बूंदे बरसाओ।
इस भीषण गर्मी को,
अब हमसे दूर भगाओ।
अनिता महेश पाणिग्राही
सरायपाली छत्तीसगढ़












