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सिसकती कली

    ​गाँव के मंदिर का प्रांगण, जो आमतौर पर शांति और प्रार्थना का केंद्र होता था, वो आज शाम शोर और रंगीन रोशनी से पटा पड़ा था। बारह साल की नन्ही कली जिसने अभी ठीक से दुनिया देखी भी नहीं थी, दुल्हन के लाल जोड़े में किसी गुड़िया की तरह सजा दी गई थी। 

नन्ही कली, रजनी की आँखों में वह मासूमियत थी जिसे देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सिहर उठे, लेकिन वहाँ मौजूद भीड़ के लिए वह केवल एक ‘रस्म’ की पूर्ति थी।
​ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते लोगों के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी, जो उत्सव के नाम पर परोसी जा रही थी। उसी भीड़ में एक ओर खड़े थे रिटायर्ड प्रोफेसर साहब। वे इस गाँव की जड़ों से जुड़े थे। सभी की तरह उनकी आँखों में वह उल्लास नहीं था बल्कि प्रोफेसर साहब की आँखों में एक गहरा, रिसता हुआ घाव था।
​उनके पास ही एक युवा खड़ा था, जो बारात की भव्यता देखकर रोमांचित हो रहा था। उसने उत्साह से पूछा, “सर, इस बार उत्सव की चमक पिछले साल से भी भव्य है न? देखिए, कितनी धूमधाम से बारात आ रही है!”
​प्रोफेसर साहब ने अपनी नज़रें उस मासूम बच्ची से हटाईं और युवक की ओर देखते हुए एक ठंडी साँस ली। उनकी आवाज़ में भारीपन था, “चमक तो बहुत है बेटा, लेकिन शायद समाज की संवेदनाएं पहले से कहीं ज्यादा खोखली हो गई हैं।”
​युवक उलझन में पड़ गया। प्रोफेसर ने दूर खड़ी उस बच्ची की ओर इशारा किया, जो बोझिल गहनों के नीचे दबी जा रही थी। “देखो बेटा, हम रस्मों और परंपराओं की चादर ओढ़कर इन कलियों को अग्नि में झोंक देते हैं। समाज में कुरीतियों का रावण आज रामायण काल से भी अधिक विशालकाय हो गया है, जो हमारी आँखों के सामने ही फल-फूल रहा है।”
​उन्होंने आगे कहा, “आज लोगों की नज़रों में वह संरक्षण और ममता का भाव कहीं खो गया है। सबने मुख पर रस्मों और मान्यताओं की मिश्री घोल रखी है, लेकिन उसी मुखौटे के पीछे, उस मासूम के सुनहरे सपनों को कुचलने का भविष्य छिपा है। नैतिकता का चोला ओढ़ना आसान है, लेकिन उस चोले के भीतर अज्ञानता का जो घोर तमस भरा है, वह इस पूरी पीढ़ी को अंधकार की ओर ले जा रहा है।”
​तभी मंदिर के पुजारी की मंत्रोच्चार-ध्वनि गूँजी। कन्यादान की रस्म शुरू हो चुकी थी। अग्नि की लपटें ऊँची उठ रही थीं, मानो वे भी इस क्रूरता को देखकर क्रोधित हो रही हों। सात फेरों में बढ़ते रजनी के छोटे-छोटे कदम उस मूक चीख के समान थे, जो हर साल इस प्रांगण में दम तोड़ती है।
​प्रोफेसर साहब की आँखें नम हो गईं। वे धीरे से बुदबुदाए, “आयु तो अभी इस बच्ची के खिलखिलाने की थी, गली-गलियारों में सरपट दौड़ लगाने की थी, मनचाहे आकाश की ओर उड़ान भरने की थी, कागज कलम से अपना भाग्य लिखने की थी लेकिन यह तो किसी तपती शिला पर खड़ी कर दी गई है। इसके अनुभव आज उन अश्रुओं में बदल रहे हैं, जिनका शाश्वत रूपांतरण सिर्फ और सिर्फ सिसकियों में होता है। लेकिन विडंबना देखो, यह खेल हर साल आद्योपान्त उसी ढर्रे पर चलता है। युवक अब चुप था …उसकी आँखों से पर्दा उठ चुका था। प्रोफेसर ने उसका कंधा पकड़ते हुए कहा, “असली मानवता उस दिन नहीं जागेगी जब हम उत्सवों के जयघोष करेंगे, बल्कि तब जागेगी, जब हम अपने भीतर की उस रूढ़िवादी सोच और दंभी अहंकार का दहन करेंगे, जो हर साल एक मासूम के बचपन की बलि माँगता है।”
​उस रात मंदिर प्रांगण की लाइटें तो जलती रहीं, लेकिन प्रोफेसर साहब के शब्दों ने उस युवा के मन में जो मशाल जलाई थी, वह सदियों से चली आ रही अज्ञानता की अँधेरी गलियों को भेदने के लिए काफी थी। रजनी का विवाह तो संपन्न हो गया, लेकिन उसके माथे पर लगा सिंदूर किसी सौभाग्य का नहीं, बल्कि समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों का अंतिम प्रमाण बन गया था। ​नन्हीं कली की उन्हीं सिसकियों की गूँज में एक संकल्प उभरा, जो भविष्य को सचेत कर रहा था। दिन के उजाले में छिन गयी आजादी के खालीपन को संकल्प ने एक नई ऊर्जा प्रदान की। जब सो जाती थी पूरी दुनिया अन्धकार के आगोश में तब रजनी का सहारा बन जाती थी लेखनी। लेखनी से बतियाती खिलखिलाती और मन की बातें करती। रजनी को मिल गया मन का साथी। लेखनी भी हर रोज रच देती कभी कविता कभी कहानी। कभी भोगा हुआ सच, कभी समाज की मनमानी। कभी हरकत बचकानी, तो कभी पत्थरों की जुबानी। कभी हल्कू और चौधरानी तो कभी राजा और रानी। कभी कलियों की कुर्बानी, कभी घायलों की निशानी।
इस तरह रजनी रातरानी बनकर महकाने लगी आस-पड़ोस। बढ़ता गया दायरा और महकने लगा सारा जहान। रजनी के संकल्प और लेखनी के साथ ने सिसकती कली की रिसते घावों की दुर्गंध को सुंगन्ध में बदल दिया।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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