
प्रभु को पहचान गया केवट,
भावुक हुआ भगवन तट आए।
प्रभु ने जब कहा कि पार करो,
मन ही मन केवट सकुचाए।।
कहां नदी नल का केवट में
तुम भवसागर के माझी हो।
प्रभु नाथ दया हम पर करना,
सदा चरणों का अरदासी हो।।
थे भाग्य खुल गए केवट के,
जब नदी घाट रघुवर आए।
केवट ने पांव पखार लिए,
माँ,लखन प्रभु थे मुस्काये।।
कहां एक ही विनती है भगवन,
चरणों का दास बना लेना।
जीवन भक्ति में डूबा रहे,
इस भक्त की लाज बचा लेना।।
कहां भक्तों को पार लगाते हो,
मुझको भी पार लगा देना।
मैं यहां तुम्हें पार लगाता हूं,
तुम मुझे वहां पर लगा देना।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश












