मत आओ मेरे पास,
दहकते आंसुओं का है एहसास।
टूटा हुआ है इस जालिम दुनिया से विश्वास,
आखिर में अपनों से कैसे लगाऊं आश।
मैं बन गया एक जिन्दा लाश।
पर सुन ओ दुनिया, अब चुप न रहूँगा,
कायर समझे थे सब, वो भ्रम कहूँगा।
अंगार बनके फूटेगा ये मौन मेरा,
अन्याय के सिंहासन को ढहाएगा
मां भारती के चरणों कि वंदना गाऊंगा।
जो टूटा विश्वास था, वो ललकार बनेगा,
गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ अब हुंकार भरेगा।
हर जुल्मी के माथे पे शोला धरेगा,
कलम की तलवार से सच को उभारेगा।
खून नहीं पानी बहा, अब खौल उठा है,
वीरों की राह पे ‘विद्रोही’ चल पड़ा है।
मत समझना मुर्दा, लाश में ज्वाला है,
एक चिंगारी काफी है, जो महाकाल पाला है।
जाग उठी है चेतना, सोया शेर भरेगा हुंकार
खड़ावदा कि धरती से जाग उठी मां भवानी कवि गोपाल जाटव विद्रोही कि कलम के रूप में करेगी पुकार
कवि: गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तहसील गरोठ, जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश
हिन्दी तिथि: ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी, विक्रम संवत 2083
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