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विश्वास पे घात

विश्वास किस पर करें
न जाने कब हो जाए घात
संवरते रहिये.. संवारते रहिये न जाने कब पड़ जाए लात
कितना भी चाहे मिले भरोसा
भरी दोपहरी में कब हो जाए रात ।

ढूंढ ढूंढ थक जाओगे
न रही वो दुनिया– निभा दे अपनी बात
दो रिश्तों में बदनियती दिखा दे कब रंग
विश्वास की वो नींव
जिस पर टिकी है जिंदगी … कब हो जाए भंग।

लहू के रिश्तों में भी… जम कर खून बहा
अखबार की सुर्खियों में ये देख
लगने लगा — विश्वास किस पर करें
दुनिया में क्या पाने को चहूं दिस छिड़ी है जंग ।

न रहा भरोसा समाज पर
वो टिका रहे विश्वास की नींव
न जाने कब पलट जाए …. कब हो जाए परजीव
वो ही जानी दुश्मन हो जाएं
जो पीढ़ी दर पीढ़ी जिये मरे थे
उखाड़ दें अपनी नींव।

वो सत्ताधारी–
सभी के सभी खास वक्त पे दिखाएं नवरंग
टूट-टूट कर बिखर जाए
विश्वास का शीशा
आम जन के हाथ-पांव को
न जाने कब कर दे अपंग को फिर अपंग।

विश्व में शक्ति के बल जो दबंग
दें जगत को भरोसा
हमारी नीति ही वो धुरी
जिससे न होगी इस धरा पे जंग
हर पल बदले वो ही रंग पे रंग
उनके अपने भी साथ छोड़ चले
फिर भी रहे वो मद में अंध ।

चहूं दिस विश्वासघात…
क्या होगा हे ! जग-नियंता
तेरे रचे इस जग में —
क्या पुनर्जन्म हुआ .. था जो असुर चंड ।

                                 महेश शर्मा, करनाल

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