
विधा-गज़ल
ज़िक्र तेरा क्या हर बार आया
तन्हा ही हमने खुद को हर बार पाया
जब जब यादों मे तेरा ही नज़ारा देखा
खुदा कसम जख्म फिर से हरा भरा देखा
तेरी ही अक्सियत को नज़र-ए-तसलिम जाना
खुदा से कम ना तेरा वजूद माना
अक्सर तन्हाईयों मे ही खता तुझे अपना के देखा
तेरी गैरियत पर ही जख्म फिर से हरा भरा देखा
तेरे दीदार के वास्ते जमाने को भी हरजाई बनाया
ख्याल जिस्मों जाँ मे बतौर रब ही तुझको समाया
जाँ से भी ज्यादा तुझको इश्क का रकीब देखा
ज़ुल्मों सितम की इन्तीहाँ कि जख्म फिर से हरा भरा देखा
रूह की ज़ानिब से तुझे अपना हमरोज़ माना
जमाना क्या खुदा से भी ज्यादा हमसाया माना
तेरी सलाइयत पर मेने इश्क अपना मरते देखा
वफा की एक आस मे जख्म फिर से हरा भरा देखा
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












