
विषय – पर्यावरण दिवस
जागो रे इंसानों जागो, कुदरत तुम्हें पुकारती,
धरती मां व्याकुल बैठी है, कौन उतारे आरती?
हरी चूनर मैली हो रही, नदियां रोती जाती हैं,
जागो रे इंसानों जागो, कुदरत तुम्हें पुकारती।
काट-काट कर जंगल हमने, ऊंचे महल बनाए हैं,
पर भूल गए हम नादान, संकट कितने बुलाए हैं।
मौसम का मिजाज है बदला, धूप बड़ी तड़पाती है,
जागो रे इंसानों जागो, कुदरत तुम्हें पुकारती।
एक पेड़ जो कटता है तो, सौ सांसें कम होती हैं,
जब चिड़िया का घर उजड़े तो, डाली-डाली रोती है।
आओ हर सूखी शाखों पर, फिर से बहारें लाते हैं,
अपने हाथों से धरती पर, नया पेड़ लगाते हैं।
धुआं उगलती ये दीवारें, ज़हर हवा में घोल रहीं,
बचा लो अपनी इस धरती को, हवाएं चीख के बोल रहीं।
प्लास्टिक को अब ‘ना’ कहना है, ये संकल्प उठाना है,
आने वाले कल को हमें, सुंदर और स्वच्छ बनाना है।
जागो रे इंसानों जागो, कुदरत तुम्हें पुकारती,
धरती मां व्याकुल बैठी है, कौन उतारे आरती?
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश













