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पथिक

मेरी सोच आपकी सोच से कुछ अलग है
मैं पथिक हूं राह मे बस मग पर मेरी नजर है
चोटिल न हो जाऊं इन कंटीले रास्तों पर
पर्वतौं से गिर रहे पत्थरों पर मेरी नजर है
आपकी निगाहें तो मंजिल पंहुचने पर हैं
सरपट शार्टकट दौड उसे हथियाने की है
नियमों का पालन मै अपना धर्म मानता हूं
ऐसे हथकंडो को मैं ओछी चाल मानता हूं
राह पर चला हूं देर सबेर पंहुच ही जाऊंगा
अडचनें झेलता मौन हो राह चलता रहूंगा।।

गोवर्धन थपलियाल
दिल्ली

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