
-गोवर्धन थपलियाल
प्रकृति का शृंगार जग जीवन का आधार
सृजन और विसर्जन नियति के सूत्रधार
कितने फल फूल खोये व्यथित नही तरुवर
चेताती प्रकृति हमें हमारे जो दूषित व्यवहार
बाज आ निज हरकतो से जीना होगा दुश्वार
नौसर्गिक सौंदर्य मिटा कर मत कर दुराचार
पर्यावरण नाश वृक्ष हत्या करना हे अनाचार
वक्त के हाथों मत बिक जा करके व्यभिचार
विकास के नाम मौत के पैगाम पर हस्ताक्षर
जल की पवित्रता,वन संरक्षण पर हो एकाग्र
जमीन की उर्वरा शक्ति बढा कर भविष्य सुधार
इहलोक औ परलोक में ही जान वृक्ष तारणहार।













