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मैं तुझें लिखूंगा

एक रात एक बात लिखूंगा,
तुझे मैं अपने साथ लिखूंगा।

बड़ा सा चाँद ठंडी सी हवा,
फिर तेरे हाथ में मैं अपना हाथ लिखूंगा।

और हकीकत में तू कभी मिलेगा नहीं,
एक किताब में तेरा साथ मुलाक़ात लिखूंगा।

मेरी किताब में सब मेरी मर्जी का होगा,
तुम सो जाओगी तो मैं दिन को रात लिखूंगा।

तेरी हँसी पर पहरे बिठा दूँगा,
कोई ग़म तेरे पास लिखूँगा नहीं।

तेरे माथे की शिकन मिटा के,
हर सफ़े पर बस मुस्कुराहट लिखूँगा।

तू रूठेगी तो मना लूँगा लफ्ज़ों से,
मनुहार की सौ सौ बात लिखूँगा।

तू दूर भी रही तो क्या ग़म है,
हर पैराग्राफ में तेरी सौगात लिखूँगा।

दुनिया कहेगी ये ख्याल है झूठा,
मैं कहूँगा यही मेरी कायनात लिखूँगा।

तू न सही हकीकत में मेरे साथ,
मैं तुझे अपनी हर ज़ज्बात लिखूँगा।

ये इश्क का वो दर्जा है जहाँ मिलना जरूरी नहीं, रहता,यादें ही काफी हो जाती हैं। किताबें गवाह हैं।

जो हकीकत में अधूरे रह गए,
वो लफ्ज़ों में अमर हो गए।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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