
मंत्रों की मधुर ध्वनि में बसा,
एक अनंत बंधन का गीत,
अग्नि साक्षी, सात फेरे संग,
जुड़ते दो जीवन अतीत से अतीत।
ना केवल तन का यह मिलन,
ना केवल सपनों की डोर,
यह आत्माओं का संगम है,
जैसे गंगा मिले सागर की ओर।
हाथों में हाथ लिए जब,
सात वचन निभाए जाते हैं,
हर जन्म की राहों में फिर,
एक-दूजे संग आए जाते हैं।
कन्यादान की पावन बेला,
आँखों में स्नेह की नमी,
बाबुल के आँगन से उठकर,
सजती एक नई जमीं।
सिंदूर की लालिमा में छिपी,
स्नेह, समर्पण की पहचान,
मंगलसूत्र की हर कड़ी में,
बंधन नहीं, है सम्मान।
संस्कृत श्लोकों की छाया में,
जब गूँजता है “सप्तपदी” का स्वर,
तब लगता है जैसे स्वयं,
आशीष दे रहे हों देव अमर।
यह विवाह सनातन परंपरा,
केवल रस्मों का विस्तार नहीं,
यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का,
जीवन भर का आधार यहीं।
मेरे मन से निकले ये शब्द,
बस इतना कहना चाहते है,
विवाह नहीं है बंधन कोई,
यह दो आत्माओं का उत्सव कहलाते हैं।
नेहा कुमारी (खुशी)
संस्कृत शोधार्थी
जम्मू विश्वविद्यालय जम्मू













