
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं,
कुछ तो बातें नई हुई हैं।
तुम्हारी आँखें ये कह रही हैं,
मुलाक़ातें किसी से नई नई है।
तुम्हारी ज़ुबाँ जो फिसल रही है,
लबों पे बातें ठहर रही है।
चुप-चुप सा रहना यही है कहता,
मोहब्बत अभी ये नई नई है।
तपिश भरी शाम है ढलती ढलती,
हवा है मस्तानी नर्म गरम सी।
नयन नशीली बता रही है,
अभी अभी कुछ नई हुई है।
कभी जो तुम थी चहकती चंचल,
तुम्हारी पग क्यों शिथिल पड़े हैं।
तेरी अदाओं में सादगी है,
तेरे दिल की रंगत चमक रही है।
धड़कनों की चालें बदल गई है,
चाहत की मिसालें बदल गई है।
जिस्मों पर छाया खुमार जो है,
अभी ये उल्फ़त नयी नयी है।
किसी से मिलने में कुछ झिझक है,
चेहरे पर निखरी नई चमक है।
आँखों में छुपा है लाज का एक घेरा,
कदम अभी ये नई नई है।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













