
जब से हुए रिटायर्
दुनिया बदल गई है,
जीवन की नाव अबतो
रुक रुक के चल रही है,
महीनों निकल गए हैं,
जूते नहीं हैं पहने,
सैंडल व चप्पलों में,
सड़कें निकल रही हैं,
कितनी थी पेन्ट शर्टें,
यह भी पता नहीं है,
टी शर्ट नेकरों में,
दिन रात कट रही है,
लेकर टिफिन का झोला,
घर से थे हम निकलते,
जाकर पकड़ रजिस्टर,
हम दिन को पक्का करते,
फिर लंच के समय में,
मिलकर के खाना पीना,
दुख दर्द बांटकर वो,
सहयोगी संग जीना,
दिन भर कलम चलाकर,
और शाम लौट आना,
रस्ते में सस्ती सब्जी,
और फल खरीद लाना,
आती हैं याद सारी,
हरकतें वो पुरानी,
पर अब बदल गई है,
पूरी ही ज़िन्दगानी,
के वी












