
शांति आज किसी संत का उपदेश नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। जिस तेज़ रफ़्तार, तनाव और शोर भरी दुनिया में हम जी रहे हैं, वहाँ अशांति न केवल घर-गाँव को तोड़ रही है, बल्कि हमारे मन को भी बीमार कर रही है।
शांति मुख्यतः दो प्रकार की होती है – आंतरिक शांति। और बाह्य शांति। दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं।आंतरिक शांति – मन का मौन ही नहीं अपितु आत्मचिंतन की आधारशिला है। आंतरिक शांति का अर्थ है मन का स्थिर होना। ईर्ष्या, क्रोध, लालच और भय जब मन में घर कर लेते हैं, तो आदमी बाहर से सब कुछ पाकर भी खाली रहता है। आज युवा नौकरी की चिंता में, बुजुर्ग एकाकीपन में और हर व्यक्ति तुलना की दौड़ में अपनी शांति खो रहा है। आंतरिक शांति योग, ध्यान, अच्छी किताबें, प्रकृति से जुड़ाव और सच्चे विचारों से आती है। जब हम खुद से सच बोलना सीखते हैं, जब हम ‘सत्य जो झुकता नहीं’ पर टिके रहते हैं, तब भीतर एक दीपक जलता है। यह दीपक ही हमें सही-गलत का भेद सिखाता है।
बाह्य शांति हमारे समाज का मजबूत आधार है।
बाह्य शांति से हमारा तात्पर्य है – परिवार, गांव और समाज में प्रेम, न्याय और समानता की स्थापना। जहाँ न्याय बिकता है, जहाँ नोट और पावर से फैसले होते हैं, वहाँ बाह्य शांति कभी नहीं आ सकती। आजकल सच्चा आदमी अदालतों में रो रहा है। यह बाह्य अशांति का ही रूप है। बाह्य शांति तब आती है जब सरकारी योजनाओं का लाभ समान रूप से मिले, जब हर घर को रोजगार मिले, जब सार्वजनिक स्थान सुरक्षित हों। जब लोग आपस में लड़ें नहीं, बल्कि मिलकर सामूहिक निर्णय लें।
निष्कर्ष: आंतरिक शांति के बिना बाह्य शांति दिखावा है, और बाह्य शांति के बिना आंतरिक शांति केवल स्वार्थ है। हमें दोनों को साधना होगा। आओ, पहले अपने मन को शांत करें और फिर अपने गांव-घर को भी। तभी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा सार्थक होगा।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित है।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।
+919587879750.












