
जिनसे पाया जीवन अपना, उनका ऋण अनमोल।
ममता की शीतल छाँव मिली, मीठे उनके बोल।
उँगली थामे राह दिखाई, दीप बने अँधियार।
गिरते पल में बाँह बढ़ाकर, बनते दृढ़ आधार।
अपने हिस्से धूप समेटी, हमको दी सुख-छाँव,
अपने सपने रखकर पीछे, दी जीवन को ठाँव।
श्रम की बूँदें मोती बनकर, सींच गईं हर साँस,
त्यागों की उस पावन मिट्टी से, महकी जीवन-आस।
पितृ तर्पण श्रद्धा का अर्पण, जल की निर्मल धार।
कृतज्ञ हृदय से अर्घ्य चढ़ाएँ, नमन करें बारंबार।
तिल-जल अर्पित कर कहें हम, स्वीकारें यह सम्मान।
आपकी दी हुई सीखों से, बढ़े कुल का मान।
सूनी चौखट आज भी जैसे, पूछ रही है पाँव,
स्मृतियों की धूप में दिखती, बचपन वाली छाँव।
पितृऋण केवल तर्पण से ही, होता नहीं समाप्त,
उनके आदर्शों को जी लेना, जीवन का है जाप।
उनके दिए संस्कार सँभालें, रखें सदा हम साथ।
पावन उनकी विरासत से, रोशन हो हर राह।
पितरों की पावन स्मृति से, निर्मल हो हर प्राण।
सेवा, श्रद्धा, सत्य से ही, हो पितृऋण का मान।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












