
हमरी भी सुन लो ओ बरखा रानी, गरजो बरसो आके अंगँनवाँ में, सूखे से राहत देव ओ महारानी।
अषाढ़वा भी बीता, सावनवाँ लगलबा, खेतवा सुखाई गये,
ना बरसा पानी, हमरी भी सुन लो, ओ बरखारानी।
नदियाँ सूखाय गईं, तलैय्या सूखाय गईं, कुवनवाँ मा ना रहिगा तनिक भरि पानी, हमरी भी सुन लो, ओ बरखा रानी।
गर्मी बहुत है, बरसे उमस है, देहियाँ से टपकत गरम गरम पानी, हमरी भी सुनि लेव, ओ बरखारानी।
खेतवा न बोई गये, धानवा न रोपाई गये, कहवाँ भुला गई बरसावै का पानी, हमरी भी सुनि लेव, ओ बरखारानी।
बगियन मॉ झुलवा, ना पड़िपाये अब तक, सखियाँ न गावैं सावन के गितवा, हमरी भी सुनि लेव ओ बरखारानी।
सतरंगी इंद्रधनुष ना दिख पाये अब तक, घटा घनघोर ना घिरीं हियाँ अब तक, हमरी भी सुनि लेव, ओ बरखारानी।
जियरा तरसि गवा, मन मोरा दुःखित भा, मोरवा न कुहकें, चिरैय्या पियासीं, हमरी भी सुनि लेव, ओ बरखारानी।
पुरवैय्या न ड़ोलय, पपीहा न कुहकैं, झूम के न बरसीं, ओ बरखारानी, हमरी भी सुनि लेव ओ बरखारानी।
ओ कारे मेघा गरजि घुमड़ि बरसौ, पानी देव पानी, दई देव गुड़ धानी, हमरी भी सुनि लेव ओ बरखारानी।
ओ बरखा रानी, ओ बरखा रानी।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ













