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माता-पिता

धरती के भगवान और हमारा परम कर्तव्य
आज के समय में एक बहुत ही दर्दनाक चलन देखने को मिल रहा है। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने में लगा दी, बुढ़ापे में वही बच्चे उन्हें अकेला छोड़ देते हैं। हाल ही में मैंने एक ऐसी ही घटना सुनी, जिसे सुनकर दिल बैठ गया। एक बुजुर्ग मां की आंखों में आंसू थे, क्योंकि उनकी बेटी बाहर शिफ्ट हो रही थी और उसने अपनी मां से कह दिया— “जय श्री कृष्ण! आप अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते।” उस लाचार मां ने रोते हुए बस इतना कहा— “शायद मेरे ही कोई बुरे कर्म रहे होंगे, इसलिए मैं किसी को दोष नहीं दूंगी। भगवान सब देख रहा है।”
कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस उम्र में बच्चों को माता-पिता की सेवा का पुण्य कमाना चाहिए, लोग उससे कतरा रहे हैं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे ऐसा परिवार मिला, जहाँ मेरे माता-पिता ने मेरी दादी और नानी दोनों को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी और अंतिम समय तक सेवा भाव से खड़े रहे। असली सेवा इसे ही कहते हैं।
आज लोग माता-पिता को बोझ समझकर वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। वे भूल जाते हैं कि अगर बचपन में उन्होंने हमारी परवरिश न की होती, तो आज हमारा अस्तित्व ही न होता। जो लोग आज अपनों से मुंह मोड़ रहे हैं, वे यह नहीं सोचते कि समय का चक्र घूमता है। आज आप जो अत्याचार अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, कल वही आपके बच्चे आपके साथ करेंगे। माता-पिता का कर्ज हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते।
वे इस धरती के जीते-जाते भगवान हैं। जो संतान उन्हें बुढ़ापे में सिर्फ थोड़ा सा प्यार और सम्मान नहीं दे सकती, वह संतान कहलाने के लायक नहीं है। याद रखिए, जो माता-पिता की कद्र नहीं करता, ईश्वर भी उसकी कद्र नहीं करता और उसका जीवन दुखों से घिर जाता है। माता-पिता आज हैं तो उनकी सेवा कर लो, कल उनके जाने के बाद सिर्फ पछतावा बचेगा।
दिशा शाह कोलकाता पश्चिम बंगाल

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