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गजल


काफिया —अन की बंदिश
रफीद —ढूॅंढ़ता हूॅं मैं।
बहर -2122–2222–2122-2=24मात्रा

प्यार कान्हा से अपनापन ढूँढ़ता हूँ मैं,
प्रेम रिश्तों में प्रिय बंधनढूॅंढ़ता हूॅं मैं।

मोर मुकुट लगी छवि को ही देखता प्रिय मैं,
श्याम रज वाला शुभ चंदन ढूँढता हूँ मैं।

रास की मधुरिम लहरों में प्रेम का सावन,
राधिका संग वही मधुवन ढ़ूँढ़ता हूँ मैं।

प्रीत वंशी की तानें सुन भाव का स्पंदन,
हर सुरों में कान्हा वंदन ढूँढ़ता हूँ मैं।

है “सुरभि” प्रभु में ही बैठी मन लगा कर अब ,
कृष्ण जैसा प्रिय दुखभंजन ढूॅंढ़ता हूॅं मैं।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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