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सुभाषित ही ख़ुशी देते हैं

सुभाषित ही ख़ुशी देते हैं हम सबको,
सुभाषित ही घावों का मरहम करते हैं,
भाषा ही ग़मों का कारण बनती है,
कुभाषित ही वाणी की पीड़ा देते हैं।

ख़ुशियाँ सब कुछ पा लेने से नहीं,
जो कुछ अपना है उससे मिलती हैं,
जो कुछ भी पास में है जिसके भी,
उसमें ख़ुश रहने से ख़ुशियाँ मिलती हैं।

जीवन में अप्रत्याशित बहुत कुछ
होता है, चाहे वह सुख का कारक हो,
या वह किसी के दुःख का कारक हो,
पर ईश्वर पर हमारी पूर्ण आस्था हो।

परिस्थिति कैसी भी हो दुःख दायी हो,
या सुखदायी हो, हृदय में प्रेम भरपूर हो,
मस्तिष्क स्पष्ट हो जहाँ वास प्रभू का हो,
उस पर पूरी आस्था और विश्वास हो।

अंधेरे में छाया, वृद्धावस्था में काया
यानी शरीर और अंतिम समय में माया,
यानी दौलत किसी का साथ नहीं देते हैं,
इन तीनों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।

मस्तिष्क का शांत होना अच्छी सोच व
कल्पना सार्थकता के लिए ज़रूरी है,
उलझा मस्तिष्क सबकुछ उलझा देता है,
मस्तिष्क शांत ध्यान, मौन से होता है।

जीवन के विकास इन्ही ध्यान, मौन
एवं शांति के ऊपर आधारित होते हैं,
आदित्य सत्कर्म और सकारात्मकता
जीवन के रचनात्मक पहलू होते हैं।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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