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जागो रे बंदे, निद्रा ने लूटा संसार: मोह की कालरात्रि से भोर तक की यात्रा


डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।

यह नींद आँख की पलक पर नहीं, आत्मा की पुतली पर पड़ी है। श्रम की निद्रा तो माँ की गोद है। किसान जब हल जोतकर खेत की मेड़ पर सोता है, मजदूर जब ईंट गारे से थककर चटाई पर गिरता है, तो प्रकृति स्वयं उसका माथा सहलाती है। यह नींद शरीर का ऋण चुकाती है। डाक्टर कहेगा गहरी नींद में कोशिकाएं बनती हैं, हार्मोन संतुलित होते हैं, प्रतिरक्षा तंत्र शस्त्र संधान करता है। अर्थशास्त्र भी कहेगा कि श्रम की नींद से ही उत्पादकता जन्मती है। जिस देश के नागरिक श्रम करके सोते हैं, वहाँ फैक्ट्री के पहिये रुकते नहीं, खेतों में सोना उगता है, सकल घरेलू उत्पाद स्वयं करवट लेता है। यह निद्रा मौद्रिक है क्योंकि यह कल के श्रम का ब्याज देती है। यह सामाजिक है क्योंकि श्रमिक की गहरी नींद से परिवार में कलह नहीं आती, बच्चे का पेट भरा रहता है। राजनीति भी इसी पर टिकी है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा कि राजा का प्रथम कर्तव्य है प्रजा को श्रम का अवसर देना, ताकि वह रात को निश्चिंत सो सके। श्रम की नींद राष्ट्रीय सुरक्षा है, क्योंकि जागा हुआ सैनिक ही सीमा पर पहरा देता है।

परंतु मदिरा की निद्रा साक्षात मृत्यु का आलिंगन है। यह वह कालकूट है जिसे शिव भी कंठ में ही रोक लें, पी लें तो संसार भस्म। जब व्यक्ति सोमरस के भ्रम में विष पीता है तो यकृत जलता है, मस्तिष्क के न्यूरॉन आपस में टकराकर चिंगारी बनते हैं। अगली सुबह सिर फटता है, हाथ काँपते हैं। यह आर्थिक आत्महत्या है। एक बोतल पर उड़ाया धन बच्चे की किताब का, माँ की दवाई का, घर की छत का होता है। सामाजिक ताना-बाना यहाँ तार तार हो जाता है। पत्नी की आँख का पानी सूखता नहीं, बच्चे बाप के साये से डरते हैं। कूटनीति के पटल पर देखो, जिन समाजों ने मदिरा को उत्सव माना वे भीतर से खोखले हो गए। रोम का पतन मद्यप नायकों ने लिखा। यह निद्रा परलौकिक मार्ग का पहला अवरोध है, क्योंकि बेहोश मन न जप कर सकता है, न तप, न सत्य का साक्षात्कार।

दुख की निद्रा सबसे करुण है। यह वह नींद है जो आँसुओं की नदी तैरने के बाद किनारे पर बेहोश पड़े मनुष्य को आती है। माँ जब बेटे की चिता को अग्नि देती है, व्यापारी जब जीवन भर की पूँजी डूबती देखता है, प्रेमी जब वियोग में पाषाण बनता है, तब शरीर हार मान लेता है। मनोविज्ञान इसे डिफेंस मेकेनिज्म कहता है। शरीर कहता है अब और पीड़ा सह नहीं पाऊँगा, तू थोड़ी देर मर जा। यह निद्रा अस्थायी युद्धविराम है। समस्या यह है कि जागने पर युद्ध फिर वहीं से शुरू होता है। दुख की नींद समाधान नहीं, केवल तारीख पर तारीख है। समाज में देखो, दुख में डूबा व्यक्ति न वोट देने जाता है, न सृजन करता है। वह भीड़ का हिस्सा बनकर भी अकेला है। राष्ट्र के लिए यह घाटा है, क्योंकि अवसादग्रस्त नागरिक नवाचार नहीं करता। पर वैदिक दृष्टि यहाँ आशा देती है। गीता का स्थितप्रज्ञ दुख में भी नहीं सोता, वह साक्षी भाव से देखता है। दुख की नींद से जागने का लौकिक उपाय है कर्म, और परलौकिक उपाय है समर्पण।

अब आओ सबसे गहरी, सबसे काली, सबसे छलिया निद्रा पर। मोह की निद्रा। यह वह निद्रा है जिसमें आँखें खुली हैं पर दृष्टि बंद है। आदमी चल रहा है, कमा रहा है, हँस रहा है, पर भीतर मुर्दा है। यह निद्रा आर्थिक है क्योंकि मोह हमें संग्रहिखोर बनाता है। हम जोड़ते जाते हैं रुपया, मकान, पद, प्रतिष्ठा, और सोचते हैं यही सुख है। पर तिजोरी भरती है और हृदय खाली हो जाता है। बाजारवाद इसी निद्रा को बेचता है। नई गाड़ी, नया फोन, नया लोन, तुम्हें लगता है तुम जाग रहे हो, पर तुम विज्ञापन के इशारे पर नाच रहे हो। यह सामाजिक कोढ़ है। मोह में पड़ा पिता बेटे को समय नहीं देता, पैसे देता है। परिणाम, बेटा भी मोह की नींद में ही बड़ा होता है। परिवार टूटते हैं, वृद्धाश्रम बनते हैं। कूटनीति में मोह राष्ट्रों को युद्ध में झोंक देता है। मेरा तेल, मेरी जमीन, मेरा धर्म, इस मोह ने विश्वयुद्ध कराए। राजनीति में मोह कुर्सी का होता है। नेता को लगता है मैं ही विकल्प हूँ, और वह तंत्र को, संविधान को, जनता को, सबको अफीम सुंघाकर सुला देता है। यह लोकतंत्र की हत्या है।

वैदिक ऋषि ने इसीलिए हुंकार भरी। उपनिषद गर्जते हैं उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। उठो, जागो, श्रेष्ठ जनों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। यह जागना केवल ब्रह्ममुहूर्त में बिस्तर छोड़ना नहीं है। यह बुद्धि का जागना है। जब तुम्हें दिखने लगे कि सुख वस्तु में नहीं, चैतन्य में है। जब तुम देख पाओ कि रुपया साधन है, साध्य नहीं। जब तुम जान जाओ कि संबंध निभाने की चीज हैं, निचोड़ने की नहीं। यह लौकिक जागरण है। इसका परिणाम क्या होगा? तुम अनावश्यक खर्च बंद करोगे, मौद्रिक अनुशासन आएगा। तुम रिश्तों में समय लगाओगे, सामाजिक पूँजी बढ़ेगी। तुम सही को सही कहोगे, राजनीतिक चेतना आएगी।

परलौकिक जागरण इससे भी आगे है। कबीर का जागना यही है। जो जागत है सो पावत है। वह परमात्मा को पाता है, पर उससे पहले वह स्वयं को पाता है। वह जानता है मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं वह हूँ जो इन सबको देख रहा है। यह ज्ञान होते ही मोह की रात कटती है। तुलसी का सूत्र देखो जानिअ तबहिं जीव जग जागा, जब सब बिषय बिलास बिरागा। जब भोग तुम्हें खींचना बंद कर दें, समझो सवेरा हो गया।

तो मित्र, व्यवहारिक बात क्या है। सुबह उठो तो पहले तीन गहरी साँस लो और पूछो आज मैं किस नींद में हूँ। अगर थकान से सोए थे तो श्रम की नींद थी, धन्यवाद दो और कर्म में लगो। अगर कल पीड़ा थी तो दुख की नींद थी, उसे स्वीकार करो पर उसमें घर मत बनाओ, उठकर एक छोटा काम करो जो कल नहीं कर पाए थे। अगर नशे की लत है तो मानो कि तुम मदिरा की नींद में हो, आज पहला कदम उठाओ, किसी से मदद माँगो, यह कायरता नहीं, शूरवीरता है। और अगर जीवन चल रहा है पर आनंद नहीं है, भीतर खालीपन है, तो समझो मोह की नींद है। इसके लिए रोज दस मिनट मौन बैठो। हिसाब लगाओ कि क्या क्या जोड़ लिया और क्या क्या खो दिया। धीरे धीरे परतें उतरेंगी।

याद रखो, सोया हुआ समाज गुलाम बनता है। सोया हुआ व्यापारी दिवालिया होता है। सोया हुआ साधक भटकता है। इसलिए संतों ने भोर भई का नारा दिया। भोर बाहर नहीं, भीतर होती है। जिस क्षण तुमने देख लिया कि मैं सो रहा था, उसी क्षण तुम जाग गए। अब खोना नहीं है, पाना है। समय पाना है, प्रेम पाना है, स्वयं को पाना है। और जो पा लेता है, वही बाँटता है। वही राष्ट्र बनाता है, वही इतिहास बनाता है। तो उठो, कंबल फेंको, मुँह धोओ, और चल पड़ो। क्योंकि जो जागत है सो पावत है, और जो अब भी सोवत है, वह सब कुछ खोवत है। यह काल का अटल नियम है, न कोई अपवाद, न कोई सिफारिश।

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