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शादी खेल नही दो दिल,परिवारों का नाजुक रिश्ता हैडाक्टर दीपक गोस्वामी


मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर, सामाजिक कार्यकर्ता है।

परिवार न्यायालय में हर दिन कई कहानियाँ खत्म होती हैं। जो लोग कभी कहते थे कि एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते, वही आज अलग होने के लिए लड़ रहे हैं। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हमने परिवार को ठीक से समझा ही नहीं।

हम परिवार को खेल समझ लेते हैं। दिल ने हाँ कहा और हमने आँख बंद करके शादी कर ली। न सोचा कि सामने वाला कैसा है, न पूछा कि उसकी सोच क्या है। बस अच्छा लगा और रिश्ता बना लिया। बाद में जब सच सामने आया तो लड़ाई शुरू हो गई। तब समझ आया कि हम तो एक दूसरे को जानते ही नहीं थे।

अदालत में तीन तरह का परिवार दिखता है। पहला झूठा परिवार। इसमें लड़के को दहेज चाहिए था, लड़की को बड़ा शहर। दोनों ने एक दूसरे का फायदा उठाया। काम निकल गया तो रिश्ता तोड़ दिया। दूसरा अधूरा परिवार। इसमें दोनों लोग अच्छे थे, पर एक को बोलना नहीं आता था, दूसरे को सुनना नहीं आता था। छोटी बात बड़ी हो गई। तीसरा अंधा परिवार। इसमें जल्दबाज़ी थी। मिले, पसंद आए, शादी कर ली। बाद में पता चला कि सोच नहीं मिलती, परिवार नहीं मिलता।

इन सबका नतीजा एक ही होता है: अदालत की तारीख। वकील, कागज़, और बहस। सबसे ज्यादा दुख बच्चों को होता है। वे न माँ के हो पाते हैं न पिता के। स्कूल में पता लिखते समय सोचते हैं कि घर किसका लिखें। उनके लिए माँ-बाप का परिवार सबसे बड़ा दुख बन जाता है।

हम गलती कहाँ करते हैं? हम इंसान से नहीं, अपनी सोच से रिश्ता जोड़ते हैं। हमने सामने वाले को वैसा नहीं देखा जैसा वह है। हमने उसे वैसा देखा जैसा हम चाहते थे। जब सच सामने आया तो लगा कि वह बदल गया। सच यह है कि वह पहले से वैसा ही था, बस हमने देखा नहीं।

तो क्या परिवार हादसा है? नहीं। परिवार तो नदी जैसा है। हादसा तब होता है जब हम तैरना सीखे बिना पानी में कूद जाते हैं। परिवार ने कभी नहीं कहा कि दिमाग का इस्तेमाल मत करो। हमने खुद ही परिवार को फिल्म समझ लिया। सोचा कि दो घंटे में सब ठीक हो जाएगा। पर ज़िंदगी फिल्म नहीं है।

परिवार को हादसा बनने से कैसे रोकें? पाँच आसान बातें याद रखें।

पहला, पहले खुद को समझो। जो खुद खुश नहीं है, वह दूसरे को खुश नहीं रख सकता।
दूसरा, आँख खोलकर साथी चुनो। शक्ल नहीं, स्वभाव देखो। पैसा नहीं, समझ देखो।
तीसरा, बात करो और सुनो भी। आधे झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि हम बोलते नहीं, और आधे इसलिए क्योंकि हम सुनते नहीं।
चौथा, झुकना सीखो। झुकना हार नहीं है। रिश्ता बचाना बड़ी जीत है।
पाँचवाँ, माफ करना सीखो। गलती सबसे होती है। हर बार सज़ा दोगे तो कोई साथ नहीं रहेगा।

अदालत जाने से पहले घर में बैठकर बात कर लो। चाय पियो। याद करो कि साथ क्यों आए थे। अगर वह वजह आज भी है तो गुस्से को छोड़ दो। अगर वजह खत्म हो गई है तो इज़्ज़त से अलग हो जाओ। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से कुछ नहीं मिलेगा।

एक आखिरी बात। परिवार की उम्र धड़कन से नहीं, समझ से तय होती है। जो सिर्फ दिल की धड़कन बढ़ाए वह लगाव है। जो मन को शांत रखे वह परिवार है। लगाव हादसा लाता है, परिवार हिम्मत देता है।

फैसला तुम्हारे हाथ में है। परिवार को हादसा बनाना है या हिम्मत। वकील को पैसे देने से बेहतर है कि एक दूसरे को समय दो। जज के सामने रोने से बेहतर है कि एक दूसरे के सामने हँसो।

उठो, सोचो। परिवार को दुर्घटना मत बनाओ, उसे रास्ता दो। आँख बंद करके नहीं, आँख खोलकर रिश्ता निभाओ। दिल से करो, पर दिमाग साथ रखो। तब न कागज़ बनेगा, न तारीख मिलेगी। तब परिवार भी बचेगा, और तुम भी।

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