
(1)
बूंद-बूंद पानी का पहरा,
मानसून ले आता है ।।
काली घटा बादल की छाती,
मयूर भी नृत्य दिखाता है ।। 🦚
(2)
बूंद-बूंद सा पानी आता,
नदियां और दरिया भर जाता ।
मौसम की भी तपिश कठिन है,
धरती का श्रृंगार सजाता ।। 🌱
(3)
बूंद-बूंद से नीर बनाता,
धरती की भी प्यास बुझाता ।
कहीं-कहीं संकट सा लगता,
कहीं-कहीं खुशियां बन जाता ।। 🌧️
(4)
बूंद-बूंद की आश बिछाए,
आने से आनंद छा जाता ।
उड़े पखेरू पंखों में रंग,
खेत-खलियान रंगाता ।। 🌾
आनंद खंडेलवाल, सिवनी (मध्यप्रदेश)











