
रिश्ते भी अब बिकने लगे हैं,
मोल-तोल भी होने लगे हैं।
जिसके पास है जितनी दौलत,
उतने ही भाव उसे मिलने लगे हैं॥
मधुर रिश्ते थे कभी पावन गंगा सी,
छोटी-सी बात पर अब होती दंगा सी।
जहाँ गूँजती थीं कभी खुशियाँ ही खुशियाँ,
उस घराने की शजर अब सूखने लगी हैं॥
दुआओँ के मोल का अलग ही है सपना,
कहीं बढ़ न जाए जो कहलाते जो अपना।
संबंधों से समझदारी अलग हुई जबसे,
अपनेपन की खुशबू सिमटने लगी है॥
आधुनिकता ने आकर मचाया हाहाकार,
साथ रहना अब सबको लगता है कारागार।
जिस घर की दहलीज़ की अपनी मर्यादा थी,
उस घर की दहलीज़ अब टूटने लगी है॥
संस्कारों की ज्योति मंद पड़ने लगी है,
अपनों के बीच भी दूरी बढ़ने लगी है।
स्वार्थ की आँधी जब से चली है जग में,
प्रेम की फुलवारी उजड़ने लगी है॥
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड











