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पिता का कंधा

जब मैं छोटा था, नादान था,
हर मुश्किल से अनजान था।
मेरे सपनों को पंख लगाने को,
पिता का हर दिन बलिदान था।
धूप में जलते खेतों में,
वो पसीना अपना बहाते थे।
मेरे कल को उज्ज्वल करने को,
अपने आज को भूल जाते थे।
खुद फटे कपड़ों में रहते थे,
मुझे नए वस्त्र पहनाते थे।
खुद भूखे रहकर भी अक्सर,
मेरे लिए निवाले लाते थे।
जब गिरता था मैं राहों में,
पिता ही हिम्मत बन जाते थे।
उनके मजबूत कंधों पर बैठ,
हम दुनिया की सैर कर आते थे।
समय बीता, मैं बड़ा हुआ,
जीवन में कुछ नाम हुआ।
तब समझ आया पिता का त्याग,
उनसे ही मेरा सम्मान हुआ।
आज भी जब थक जाता हूँ,
जीवन की राहों में कहीं।
पिता की सीख याद आती है,
और हिम्मत हारता नहीं।
पिता कोई साधारण शब्द नहीं,
ये तो जीवन का आधार हैं।
भगवान दिखें या न दिखें,
पिता ही मेरे सच्चे संसार हैं।

आर. एस. लॉस्टम

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