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शौक नही,मजबूरी है

खेलने,कूदने के उम्र मे
पढना लिखना हो मन मे
आराम से खाने पीने की
आवश्यकता हो जिसे बचपन मे
उनके हाथो मे कचरा चुनने की बोरी हो,
जूठे कप प्लेट की थाली हो
माथे मे सामान की गठरी हो
तो इनके शौक नही मजबूरी है
इसे कुछ लोग बाल श्रम कहते हैं
लेकिन कोई उनके मजबूरी को ना समझते हैं
कि आखिर वो सब ऐसा क्यों करते हैं?
बाल श्रम उन्मूलन हेतु
कई योजनाओं का तैयार किये है सेतु
लाखो करोडों खर्चे करते हैं
और बाल श्रम की बात करते हैं
लेकिन एकबार उन बच्चों के परिवार का सुध कोई नही लेता है
कि आखिर ये बाल श्रम क्यों करता है?
उन बच्चों के परिवार मे अधिकतर
सदस्य मिलेंगे बीमार और लाचार
कही कही मिलेगा माँ बाप बेरोजगार
कठिनाई से गुजरता है घर संसार
ऐसे वक्त मे वो बच्चे अपने बालपन भूलकर
उठा लेते हैं बोरी,गठरी और कुदाल
लेकिन ये बाल श्रम ठीक बात नही है
इसे मिटाने का प्रयास ही सही है
हमसबो को मिलकर बाल श्रम को मिटाना होगा
हरेक बच्चों को शिक्षा और माँ बाप को रोजगार देना होगा

चुन्नू साहा पाकूड़ झारखण्ड

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