
कविवर मुझको भी मंचों पर गाने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
नामी कवि को कविवर सिर्फ़ गवाते हो।
कभी मंच पर हमको नहीं बुलाते हो।
अपनी मर्ज़ी सबपर सिर्फ चलाते हो।
खुद को ज्ञानी सबको मूढ़ बताते हो।
कभी हमें भी अपनी जीभ चलाने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
सभी जगह पर अपना जाल बिछाते हो।
अच्छे कवियों को तुम धता बताते हो।
ओछे कवियों से निज मंच सजाते हो।
अच्छे कवि को मंच हेतु तरसाते हो।
मुझको भी किस्मत अपनी चमकाने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
हम भी अच्छी रचनाएं लिख लेते हैं।
श्रोताओं में नव ऊर्जा भर देते हैं।
ग़ज़ल,गीत,दोहा,मुक्तक सब गाते हैं।
जहां कहीं भी जाते हैं छा जाते हैं।
अपना जलवा मंचों पर दिखलाने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
कई विधाओं में रचना हम लिखते हैं।
मोती जैसे मेरे शब्द चमकते हैं।
हमें नहीं फिर क्यों कवियों में गिनते हैं।
नहीं तुम्हें क्या मुझमें कवि गुण दिखते हैं।
हमको भी अपना परचम फहराने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
लेखनी न मेरी ऐसे बर्बाद करो।
मकड़जाल से हमको अब आजाद करो।
बेशक प्रस्तुति मेरी सब के बाद करो।
पर आयोजन हेतु हमें भी याद करो।
हमको भी अपनी पहचान बनाने दो।
गीत मधुर कुछ अपने हमें सुनाने दो।।
राम जी तिवारी"राम"
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)












