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अनन्य-प्रेम

प्रेम से सींच लिया है अब शुक-मैना ने ये तन-मन।
प्रेम ढोलकी बाज उठी,जिया धडकाए उच्छल-तरंग।

बुद्धि है एक बाज शिकारी, संग उड़े वो क्षण-क्षण।
हिय भावना है एक मैना जिसका’ कर लें वो हरण।

ये जग भी एक बाज हिय पर बरसावे चोंच चुभन।
प्रेम निभे युगल में सत्य प्रीत और आत्मीय लगन।

बोले बिन हिय को हिय कौन सुनाए तड़पत ये मन।
प्रेम बयार में खो जाएं ,हिय धधके जब प्रेम अग्न।

निद्रा तव उड़ जाए, ये हिय तडपत जब प्रेम-लगन।
तब दिल दिल को सुनाए,दिनरात बढे ये प्रेम अगन।

दिल पे न बस किसी की मुरली बजे हो राधा मग्न।
कुंज बिहारी राधा संग नृत्य आनंदित हों निधिवन।

महेश शर्मा- करनाल

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