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फकीर और दुनियाँ

फकीर हूँ दुनियाँ अहसास करा देती है
दो कौड़ी की हैसियत थूककर हमे जता देती है

समय सबका खराब आता है
कौड़ियों मे आदमी सिमट जाता है

बिगड़ते समय के बिगड़ते ज़ज़्बातों को कौन सर आँखों मे लेता है
सेवा कम ज्ञान ज्यादा भी अहसान के भावों से करता है

बखत तो इंसान की शमशान मे नज़र आती है
फूंकने के लिये भी लाइन लगानी पड़ जाती है

रिश्ते नाते तो कलयुग की भेंट चढ़ गये
पचास साल ज़िंदा रहनेवाले पचास मिनट मे फुँक गये

जब तलक जिस्म मे साँस है
तभी तक अपनों का साथ है

जीने के संघर्ष मे हे मालिक निराश हो गया हूँ
था इंसान कि अब पिशाच हो गया हूँ

दुनियाँ से भरोसा मेरा तार तार हो गया
प्रेम की राह मे नफरतों का बाज़ार हो गया

आँख के आँसुओं मे ज़ज़्बात भी सूख गये
जीते जी जिन्दा एक इंसान से मुर्दा हो गये


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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