
महिलाएं आज न केवल अपने परिवार को संभाल रही हैं, बल्कि साथ ही साथ उन्हें आर्थिक रूप से भी मजबूत कर रही हैं। वर्तमान में महिलाओं ने अपनी नई छवि का निर्माण किया है अब वह चूल्हा चौका तक सीमित न होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई हैं। अब वह सिसक - सिसक कर रोने वाली नहीं रही। उसने अपनी शक्ति को पहचान लिया है।
“जी हां मैं एक जगी हुई स्त्री हूं
मैंने अपनी राह देख ली है
अब मैं लौटने वाली नहीं
मैंने ज्ञान के बंद दरवाजे खोल दिए हैं
बहनों ,भाइयों !मैं अब वह नहीं हूं जो पहले थी”
महिलाओं को स्वतंत्रता तो मिल गई किंतु आज भी उसे वह सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जा सकती, जिसकी वह हकदार है। महिलाएं न केवल सृष्टि का विस्तार करती हैं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाती हैं।
एक बात अनिवार्य रूप से मानना है कि हर व्यक्ति अपनी लड़ाई खुद लड़ता है।
नारी की स्वतंत्रता —
*अपने विचार रखने की स्वतंत्रता
*अपना निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता। पढ़ाई जॉब शादी या जो भी क्षेत्र हो अपने निर्णय खुद लेना ही स्वतंत्रता है।
*कुछ गलत हो रहा है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने की आजादी, लेकिन जब गलत हो उसी समय।
*अपने मन के अनुसार कपड़े पहनना।
हमारी संस्कृति में नारी का स्थान देवी के रूप में माना गया है। आज हर क्षेत्र में सफलता का परचम लहरा रही हैं। नारी स्वतंत्र है पर नारी को अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
नारी की स्वतंत्रता की एक सीमा होनी चाहिए। स्वतंत्रता का मतलब यह कदापि नहीं कि अपने संस्कार, अपनी मर्यादा, अपना कर्तव्य, आदर सम्मान की भावना, नियमों का पालन करना भूल जाएं। लज्जा नारी का आभूषण है ।उसे ताख पर रख देना क्या यह स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं है…?
आजकल पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने की होड़ लग गई है। आधे- अधूरे परिधान पहनना..
जिसे देख नजरें नीची हो जाए।
शादी के पहले ही लिव इन रिलेशनशिप में रहना।
शादी से पहले प्रीवेडिंग का चलन हो गया है। क्या यह सही है…?
अपनी प्राचीन संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति की वेशभूषा, प्रदर्शन के आभूषण अपनी मर्यादा में होनी चाहिए। माता-पिता या अभिभावक को इस पर रोक लगानी चाहिए।
आज बड़े घरों की पार्टी में महिलाएं धूम्रपान और शराब
लेती हैं जो हमारे संस्कार के विरुद्ध है। यह स्वतंत्रता कैसी…?
नारी और पुरुष दोनों को सामाजिक, पारिवारिक एवं राजनीतिक मर्यादा का पालन करना चाहिए।
नारी की स्वतंत्रता एक सीमा तक ही स्वीकार्य है।
“अति सर्वत्र वर्जयेत”स्वतंत्रता का
मतलब यह नहीं की जो मन में आए करें।
डॉ मीना कुमारी परिहार












