
भूलती नही वो शाम की एक बरसात
आमने सामने खड़े हम भीगे साथ साथ
होश ना था खोये थे एक दूजे के दीदार मे
जैसे मन मचल रहा हो तेरे मेरे इंतज़ार मे
वो पल जहन से अब जाता नही
बरसात का वो मंजर अब आता नही
वो शाम भी अजब सुहानी थी
सिर्फ ओर कुछ नही मेरी उसकी तड़फ की निशानी थी
वो भी क्या बरसात थी
नैनों से झिरते अश्कों की मौन एक आवाज थी
आस्माँ से गिरते पानी मे नयनो के अश्क भी शामिल थे
एक अनचाही प्यास मिलन की नाकाम- ए – इश्क काबिल थे
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












