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उलझन मे हूँ

कुछ ख्वाब है मेरे,
न जाने कब होगे पूरे ?
प्रयास तो है जारी,
फिर भी है अधुरी।

अपने ही लगा दिये हैं अड़ंगा ,
बने हैं वो सियार रंगा ।
साथ मे रहकर दिया है घाव,
छिपकर दिखाया है अपना स्वभाव ।

सच कहते हैं लोग यहाँ ,
चेहरा रंगकर अपने बैठा है जहां तहाँ ।
सोच समझकर ही कदम उठाना,
नही तो कसर नही छोडेगे जमीन छीनना ।

मर गया है सबका यहाँ जमीर,
भूखे नंगे है फिर भी कहता है खुद को अमीर ।
चुन्नू कवि है हताश और निराश,
किस पर करे भरोसा और किसपर विश्वास?

चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड

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