
प्रतापनारायण मिश्र
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।
हिंदी का भाग्य जब भारतेन्दु की ज्वाला से तप रहा था, तब उसी अग्नि से एक और तेजस्वी रत्न निखरकर सामने आया। वह रत्न था पंडित प्रतापनारायण मिश्र। उन्नीसवीं शताब्दी की संध्या में हिंदी गद्य अभी शैशव में था। उसके पैरों में संस्कृत की बेड़ियाँ थीं, मुँह में ब्रज की मिठास थी और कानों में फारसी की खनक थी। ऐसे में हिंदी को एक ऐसी साँस चाहिए थी जो उसे धरती से जोड़े, माटी की गंध दे। वह साँस मिश्र जी की कलम बनी। उन्होंने कलम नहीं चलाई, उन्होंने क्रांति लिखी।
बैजेर गाँव की धूल में संवत 1913 में जन्मे इस ब्राह्मण पुत्र को देखकर भारतेन्दु ने तत्काल पहचान लिया कि यह साधारण दीप नहीं, यह दूसरा चंद्र है। चंद्र इसलिए कहा क्योंकि मिश्र जी की भाषा में आग नहीं, चाँदनी थी। वह चाँदनी जो मन को शीतल कर दे, जो कटु सत्य को भी अमृत बना दे। उन्होंने शब्दों को शस्त्र नहीं, सखा बनाया। पाठक को लगा जैसे कोई अपना बैठा है, हँसते-हँसते भीतर तक झकझोर रहा है।
उन्होंने निबन्ध को सिंहासन से उतारकर चौपाल पर बिठा दिया। अब तक निबन्ध का अर्थ था शास्त्र का भार। मिश्र जी ने कहा नहीं, निबन्ध का अर्थ जीवन है। इसलिए उन्होंने टट्टेरी को चुना, भौं को चुना, दाँत को चुना, पेट को चुना। भौं पर लिखते हुए वे कहते हैं कि वही भौं कभी क्रोध की बिजली बनती है, कभी आश्चर्य का मेहराब बनती है, कभी व्यंग्य की तलवार बनती है। एक अंग को उन्होंने सम्पूर्ण मनुष्य बना दिया। यह दृष्टि कोई साधारण लेखक नहीं दे सकता। यह दृष्टि वही दे सकता है जिसकी आँखों में प्रेम हो और जिह्वा पर सत्य।
सन 1883 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा। कानपुर की गलियों से ब्राह्मण नाम की एक पत्रिका निकली। ब्राह्मण नाम था, पर हृदय उसका पूरे भारत के लिए धड़कता था। उस पत्रिका के हर पृष्ठ से अंग्रेजी की सत्ता काँपती थी, पाखंड की दीवारें गिरती थीं और हिंदी का स्वाभिमान सीना तानकर खड़ा होता था। मिश्र जी ने ब्राह्मण को केवल कागज नहीं रहने दिया, उसे विचार की तलवार बना दिया। उस समय भाषा का रूप अभी गीली मिट्टी था। उन्होंने उसे अपने हाथों से गढ़ा। उर्दू की कृत्रिमता हटाई, संस्कृत की कठोरता घिसी और बीच में से निकली वह हिंदी जिसे पंडित भी पढ़े और हल चलाने वाला किसान भी समझ जाए। यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी।
रंगमंच पर भी उन्होंने आग लगा दी। हठी हमीर में इतिहास बोला, कलियुग में समय चीखा और भारत-दुर्दशा में तो भारतमाता स्वयं मंच पर आकर रो पड़ी। रोगिणी भारतमाता के चारों ओर आलस्य, दुर्व्यसन और परमुखापेक्षिता का जो तांडव उन्होंने दिखाया वह कोई कल्पना नहीं थी, वह दर्पण था। दर्पण में अपना मुँह देखकर भी जो समाज न चेते, उस पर इससे बड़ा प्रहार और क्या होगा। उनके संवाद पुस्तक के नहीं थे, वे बाजार के थे, चौराहे के थे। इसलिए अनपढ़ भी सुनकर समझ गया कि यह नाटक उसके लिए लिखा गया है।
मिश्र जी का रोम-रोम हिंदी था। निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। यह उनका वाक्य नहीं, यह उनकी साँस थी। जब पूरा पढ़ा-लिखा वर्ग अंग्रेजी की ओर दौड़ रहा था, तब वे अकेले खड़े होकर बोले कि बिना भाषा के स्वराज भी परतंत्रता है। उन्होंने दिखा दिया कि मातृभाषा में सोचना ही सच्ची स्वतंत्रता है। यह बात आज भी उतनी ही खरी है जितनी सौ वर्ष पहले थी।
उनकी निर्भीकता का कोई सानी नहीं। वे झुके नहीं, बिके नहीं। बाल विवाह हो या मिथ्या आडंबर, विधवा की पीड़ा हो या समाज का पाखंड, वे सब पर बिना नाम लिए प्रहार नहीं करते थे, नाम लेकर करते थे। पर आश्चर्य यह कि उनका प्रहार भी प्रेम से सना होता था। बड़े भाई जैसा डाँटते थे, पर हृदय से लगाकर समझाते भी थे। इसी कारण लोग उनसे रूठते नहीं थे, उनसे जुड़ते थे।
इकतालीस बसंत देखकर 5 जून 1894 को वे चले गए। पर गए नहीं, वे रह गए। रह गए अपने शब्दों में, अपने ब्राह्मण में, अपनी भारत-दुर्दशा में। राष्ट्र ने भी देर से ही सही, पर ऋण स्वीकार किया। 1 नवम्बर 2013 को 500 पैसे का डाक टिकट उनके नाम हुआ। वह टिकट नहीं था, वह इतिहास की स्वीकृति थी कि जिन्होंने भाषा के लिए प्राण दिए, राष्ट्र उन्हें भुला नहीं सकता।
यदि एक शब्द में मिश्र जी को बाँधा जाए तो वह शब्द है लोक। उनका हर अक्षर लोक के लिए था, लोक के बीच से था, लोक तक जाता था। उन्होंने हिंदी को व्याकरण का बंधक नहीं रहने दिया। उसे जन की धड़कन बनाया।
आज जब स्क्रीन पर भाषा बिखर रही है, जब मुहावरे मर रहे हैं, तब मिश्र जी की कलम हमें पुकारती है। वह कहती है कि भाषा को बचाना है तो उसे नए विषय दो, नए दर्द दो, नए सपने दो। उसे पुस्तकालय से निकालकर खेत में, कारखाने में, चौपाल में ले जाओ। साहित्य यदि केवल ताली बजाने के लिए है तो वह व्यर्थ है। साहित्य का काम मनुष्य को मनुष्य बनाना है।
पंडित प्रतापनारायण मिश्र केवल भारतेन्दु युग का लेखक नहीं थे। वे उस युग की आत्मा थे, उसकी पीड़ा थे, उसका संकल्प थे। उनकी कलम सचमुच सोने की थी। क्योंकि उससे जो स्याही टपकी वह काली नहीं थी, वह त्रिवेणी थी। देशप्रेम, भाषाप्रेम और मानवप्रेम की त्रिवेणी। पुण्य तिथि पर हम फूल नहीं चढ़ाते। हम अपने भीतर की हिंदी को जीवित करने का व्रत लेते हैं। यही उनके चरणों में सबसे बड़ा अर्पण है।













