
आज आँगन की चिड़िया परदेस जाएगी,
जिसे थाप देकर मैंने सुलाया था।
जिसके टूटे खिलौने आज भी,
अलमारी में संभाल कर रखे हैं।
सुबह से माँ का हाथ कांप रहा है,
हल्दी के लड्डू बांधते-बांधते।
“बेटा गर्म पानी से नहाना”
कहते-कहते गला भर आता है।
पापा छत पर जाकर सिगरेट फूंक रहे हैं,
ताकि कोई आँसू देख न ले।
20 साल की कमाई एक ट्रॉली में,
और जिंदगी एक डोली में जा रही है।
बेटी सबसे नॉर्मल बात कर रही है,
“दी, मेरी चूड़ियां संभाल लेना”।
पर जब अकेले में आईना देखती है,
तो उसकी पलकें धोखा दे जाती हैं।
वो कोना खाली हो जाएगा,
जहाँ वो पढ़ते-पढ़ते सो जाती थी।
वो रसोई सूनी हो जाएगी,
जहाँ वो “माँ भूख लगी” चिल्लाती थी।
विदाई की बेला आई,
डोली के सामने सबकी हंसी गायब।
बेटी पापा के पैर छूती है,
और पापा पहली बार कमजोर पड़ जाते हैं।
“बेटा, ससुराल अपना घर है,
वहाँ राज करना” कह तो दिया।
पर अंदर से आवाज आई –
“मेरा घर अब आधा रह गया”।
गाड़ी स्टार्ट हुई, धूल उड़ी,
और हम हाथ हिलाते रह गए।
घर लौटकर लगा जैसे,
घर में से रौनक ही चोरी हो गई।
लोग तसल्ली देते हैं “वो खुश रहेगी”,
हम मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाते हैं।
पर रात को तकिये गीले होते हैं, क्योंकि विदा बेटी की नहीं… एक बाप की सांसें होती हैं।
सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार
एवं अप्रकाशित रचनाएँ
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













