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संकल्प साधना व अभीष्ट पूर्ति

सत्कर्म साधना, अभीष्ट की पूर्ति
दृढ़ता से सन्मार्ग का चयन होता है,
संकल्प भाव विषयक भी होता है,
और अभाव विषयक भी होता है।

अभीष्ट क़र्म करना या नहीं करना है,
यही विपरीत संकल्प लिए जाते हैं,
प्रायः सभी संकल्प आवश्यकता के
आधार पर मनुष्य द्वारा लिए जाते हैं।

गार्हस्थ्य से विरत जीवन में तप त्याग
जैसे कठिन से कठिन संकल्प होते हैं,
साधारण से इंसान अक्सर जीवन
की ज़रूरत से संकल्प लेते रहते हैं।

उन्हें संकल्प पूर्ति के सत्य व असत्य
रूपी दोनो ही साधन भी मिल जाते हैं,
साधन के हर तरह के उपयोग से ये
संकल्प पूर्व निर्धारित हो जाते हैं।

संकल्प का न होना भाव-अभाव
के साधन का प्रयोग नहीं होता है,
संकल्प विहीन मानव जीवन प्रायः
किंकर्तव्यविमूढ़ होकर रह जाता है।

संकल्प का शुभ या अशुभ होना भी
मन: स्थिति के कारण ही होता है,
खेत में मिर्च की पौध लगाई है तो
फसल से गन्ने का रस नहीं मिलता है।

संकल्प और विकल्प मन के धर्म हैं,
यही मनीषियों ऋषियों के कथन हैं
पवित्र मन हमें पवित्र संकल्प देता है,
अपवित्र मन अपवित्र संकल्प देता है।

आदित्य शिव ही सदा शुभ होता है,
अशिव तो अशुभदायक हो जाते हैं,
शिव संकल्प से परहित, मोक्ष मार्ग
तक मानव जीवन में मिल जाते हैं।

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र,
‘आदित्य’, विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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