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बरसते रहे बनकर बादल

पूर्णिका


प्रारम्भी नेह:-
बरसते रहे बनकर बादल, शहर भर में दीवानों की तरह।
तुम ना निकले सनम ,बारिश में कीमती सामानों की तरह।।

रिमझिम बारिश की ,ठंडी फुहारों में सनम तुम संग भींग न सकें,
सावन की बारिश बनकर ,बरसाते रहे शहर में परवानों की तरह।।

बड़ी हसरत थी,बारिश बनकर तेरी जुल्फों को भिगोना चाहते थे,
ज़माने से डरकर बैठी ,पढ़ती रही इश्क़ तुम दास्तानों की तरह।।

सावन की छड़ी में,झूम के गीत गाता रहा, सावन तेरे इंतज़ार में,
बहती रही मेरी मुहब्बत की कश्ती,काग़ज़ी सामानों की तरह।।

बरसते रहे तेरे आँगन में, रात भर हम तो सनम,
बरसते हुए देखते रहे सनम तेरी आँखों को मयखानों की तरह।।

बेइंतहा मुहब्बत ,कसमें, वादें सब तेरे लिए ही थे सनम,
सनम तुम ना समझें मेरी कीमत ,क़द्रदानो की तरह।।

परिचयी नेह:-
तेरे इन्तज़ार में पूरा सावन, अश्क़ बनकर बरसते रहे ‘अर्तिका ‘
मेरी मुहब्बत को तुमने, भुला दिया बेगानों की तरह।।

पूर्णिकाचार्य
उमा शर्मा अर्तिका

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