
कैसा जमाना अब नया आ गया है
अपना खून भी पराया हो गया है
बडे नाजों से पाल जिसे बडा किया
जिसको मां ने प्राणों से ज्यादा चाहा
बिना जिसके कभी खाना नही खाया
ड्योढी पर खडी रही जबतक घर न आया
बेटा भी अपनी सारी पगार मां को ही देता
विवाह की बात पर कहता कुछ कमाने दो
आपने काफी कष्ट सहा कुछ तो सुखी रहो
उसकी हर सेवा भाव अंतस को था छू जाता
ऐसा भी समय आएगा कभी सोचा न सहा
दिन पलटते जरा भी देर नही लगी
बीबी नौकरीवाली नकचढी जो मिल गई
अहम भाव दोनों का जल्दी टकराने लगा
उनकी नोकझोंक ने मां को चुप कर दिया
घर की लज्जा न निगलते बना न उगलते बना
खिलखिलता परिवार लडाई का अखाडा बना
रिश्ता जो भी ऐसा करो जो सूझबूझ हो भरा
अंतस को आनंदित करे मन प्यार से पगा।
गोवर्धन थपलियाल













