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गज़ल लिखता हुं तो

मैं जब कविता लिखता हूं नज़्म को लिखा करता हूं, गज़ल लिखता हुं तो,

लेखक बनकर लिखता हुं ,
जब मैं पढ़ता हूं सुनता हुं,तो श्रोता बन कर खुद कि कविता सुनता हुं मुझे गलतियों का
अम्बार नजर आता है ,
अभ्यास में उतर जाने पर फिर से हटाता मिटाता घटाता हुं,जब मैं बाध्य हो कर सिमट जाता हूं

फिर टिकता हुं सोचा करता हुं, संकोच करता हूं विश्राम करता हूं।

एक दिन एक बार एक लड़का और मैं अपने कमरे में बहस चली कि कविता लिखने से क्या फायदा है क्या मिलेगा और क्यों लिखते हों ,
दिमाग चलाओ तो काम धाम में चलाओ, दिमाग लगाओगे तो कुछ करके दिखाओ, तुम तो बहुत ही फालतू काम कर रहे हों,, क्या है माजरा क्या है फायदा?

मैं बोला —
यह मां सरस्वती वंदना स्वीकार करके लिखने पढ़ने में मंचन करने में समर्थ हो सकता है,
इससे परोपकार, सोहार्द प्रेम , समाज में शिक्षा का विस्तार होगा,
देश भगति और उसके बाद इंसानियत का पाठ सिखाया जाता है, पढ़ें लिखे लोगों को दोस्त बनाना आसान हो जाता है, बढ़ो के साथ सम्मान और छोटों को प्यार की भावना पैदा होती है,
बचपन लौट कर आता है, जवानी की हंसी-मजाक और ठहाके लगाने वाले मिलते हैं,
वीर महापुरुष को भी याद किया जाता है, श्रृंगार कविता में तो भाव
रसीले होंठों पर गुलाब सी मुस्कान भरी जाती है,
आदमी,आदमी को जीवन जीना सिखाता है,
मर्यादा पुरुषोत्तम राम बना दिया जाता है,
कृष्ण की सी प्रेम रस बरसाती कविता पाठ, स्नेह, प्यार से निभाना जानने लग जाता है,
मन महक उठता है, जीवन सरल सहज और व्यवस्थित किया जाता है
मन लचिला और तन स्फूर्ति वान हों जाता है,समझ प्रखर हो जाती है हर चेहरे पर मुस्कान बरसती है,, कविता मेरी फितरत है कविता मेरी नज़रें करम है,
कविता कोश में संकलित किया जाए तो उम्र भर शब्दों का धनवान होता है ।
आदमी का सम्मान होता है।।
मरने के बाद भी आदमी जिंदगी जिता है,
ऐसी ज्ञान और विज्ञान चेतना पर केन्द्रित है मेरी कलम से अछुती नहीं है मेरी कविता।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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