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न्याय की पुकार

लोकतंत्र की धरती पर, जब अन्याय का अंधेरा छाता है,
एक मासूम की चीखों से, हर दिल कांप जाता है।

तेरह बरस की उस बेटी का, दर्द कौन समझ पाएगा,
टूटे सपनों का बोझ भला, कौन उठाकर निभाएगा।

कानून की चौखट पर अब, उम्मीदों के दीप जलें,
दोषियों को कठोर दंड मिले, ताकि डर के साए ढलें।

नारी की गरिमा की रक्षा, केवल शब्दों से न होगी,
न्याय, सुरक्षा और सम्मान से ही नई सुबह होगी।

समाज अगर चुप बैठा रहा, तो अपराध बढ़ते जाएंगे,
हमें मिलकर आवाज़ उठानी होगी, तभी बदलाव आएंगे।

हर बेटी को निर्भय जीवन का अधिकार मिले संसार में,
न्याय की रोशनी फैलानी होगी इस पूरे समाज में।

कवि अनन्य का संदेश:
“जहाँ बेटियां सुरक्षित होती हैं, वही समाज सच में सभ्य कहलाता है। कानून का सम्मान और अपराध के विरुद्ध आवाज़—दोनों मिलकर ही न्यायपूर्ण भविष्य बना सकते हैं।”

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