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पूर्णिका- हिंदी भाषापरिवर्तनीय- आन, स्थानीय- है

प्रारंभी नेह:
हिंदी है हम, हिंदी भाषा ही, हमारी पहचान है।
संजोकर रखना है इसको, यह भारत का अभिमान है।१।

सारा जग जाने हमें, हिंदी कह कर बुलाते हमें।
अपनी भाषा के नाम से, हिंदुस्तानियों का सम्मान है।२।

वेद, पुराण, गीता, भागवत, मनुस्मृतियों में संस्कृत लिखी।
सामान्य जीव तक पहुंचाती, हिंदी ही तत्व ज्ञान है।३।

अंग्रेज छोड़कर चले गए, पर भाषा अभी स्थाई यहीं।
क्यों ना हिंदुस्तान में अब भी, हिंदी ही दृश्यमान है।४।

आने वाली पीढ़ी हमारी, विदेशी भाषा पर है आकर्षित।
न बोले अपनी भाषा हिंदी, ये संस्कृति में व्यवधान है।५।

नहीं राष्ट्रभाषा जैसा सम्मान, होता सरकारी काम अंग्रेजी में।
कैसे युवा पीढ़ी को ज्ञान दें, बड़ी ही खींचतान है।६।

बाटें ज्ञान युवा पीढ़ी को, समझाएं महत्व अपनी भाषा का।
हर देश में देखो मातृभाषा, उनकी ही विद्यमान है।७।

परिचयी नेह :
एक दिशा जो दिखे ‘वृंदा’, जोड़ो युवा को अध्यात्म से।
सुनाएं सत्संग पढ़े ग्रंथों को, हिंदुस्तान देवस्थान है।८।

हरि बोल!
सारिका शर्मा ‘वृंदा’
ओमान

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