
विद्यार्थी वह नहीं जो ,
केवल ग्रंथों के पृष्ठ पलटता है,
विद्यार्थी वह है जो,
अपने भीतर के अंधकार को पढ़ता है।
अक्षर तो बहाना हैं,
ज्ञान तो आत्मा का जागरण है,
विद्यालय की देहरी से आगेमन का ही
वास्तविक आचरण है।
गुरु केवल उत्तर नहीं देते,
वे प्रश्नों की अग्नि जलाते हैं;
क्योंकि सत्य कभी सिखाया नहीं जाता,
उसे तो भीतर से जगाया जाता है।
कलम जब अहंकार छोड़ देती है,
,तभी वह प्रार्थना बन जाती है ,
स्याही जब समर्पण में डूबती है,
तभी शिक्षा साधना कहलाती है।
हर परीक्षा जीवन का दर्पण है,
जहाँ अंक नहीं, अंतःकरण परखा जाता है,
जो स्वयं पर विजय पा ले,
वही सच्चा विद्वान कहलाता है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













